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आबिद सुहैल साहब लखनऊ ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान में अदब और सहाफत की बा-वकार और मोतबर शख्सियत के तौर पर पहचाने जाते हैं. उनकी इल्मी लियाकत गुज़िश्ता साठ सालों से मुस्तकिल पढ़ने लिखने की दुनिया पर ग़ालिब है. आफसाने, तनकीद, रिपोर्ताज, तंज़, आटोबायग्रफी जैसी कई सिन्फे सुखन, उनके जादुई कलम से यकसां खूबी के साथ काग़ज़ की हकीर सतह पर नाज़िल होती हैं. कलम के इसी जादू ने 25 से ज्यादा किताबें मंज़र-ए-आम पर लाई हैं. इसके साथ ही बेशुमार एज़ाज़ भी. पिछले साल ही उनहे उर्दू के सबसे बड़े अवार्ड्स में से एक मौलाना आज़ाद नेशनल अवार्ड से नवाज़ा गया है. साथ ही उनकी आटोबायग्रफी के लिए उन्हे दिल्ली उर्दू अकादमी की पहली नेशनल फेलोशिप भी मिली है. उनकी किताबों जैसे ‘गुलाम गर्दिश’,’सबसे छोटा ग़म’ और ‘जीने वाले’ को भी बेपनाह मकबूलियत के साथ कई अवार्ड मिले हैं. इसके अलावा नेशनल हेरल्ड, द पायनियर, द टाइम्स आफ इंडिया, कौमी आवाज़ जैसे कई अखबारों के साथ भी उन्होने ऊंचे ओहदों पर काम किया है.

27 नवंबर 1932 को उरई में पैदाइश पाए आबिद सुहैल साहब 1948 में हाईस्कूल पास करने के बाद लखनऊ आए. लखनऊ की अदबी आबो-हवा उन्हे इसकदर रास आई कि अगले ही साल बेहद कम उम्र में वे अंजुमन-ए- तरक्कीपसंद मुसन्निफीन यानि पीडबलूए के मेम्बर बन गए. शुरूआत से ही वे एक कमिटेड कम्यूनिस्ट रहे और उनकी कलम भी उनकी सियासी सोच से शिद्दत से मुतासिर रही.कम्यूनिज्म की इसी सोच पर यकीन के सबब उन्होने ज़मींदार खानदान से होने के बावजूद अपनी सारी ज़मीन को जाने दिया. ज़िंदगी चलाने के लिए उन्होने रिक्शा भी चलाया, किताबें बेची, ट्यूशन पढ़ाया लेकिन अपनी सोच और खुद्दारी से कभी समझौता नहीं किया. महापंडित राहुल सांकृत्यायन से उनके गहरे मरासिम थे. वजह थी बुद्धिज्म में अकीदत. इसके अलावा फैज़, साहिर, मजाज़, मजरूह जैसे तरक्की पसंद अदीबों का दस्ते शफकत भी उनके ऊपर रहा.

आबिद सुहैल साहब के साथ गुफ्तगू करना अदब के एक पूरे दौर और तारीख के साथ गुफ्तगू करने जैसा है. चंद रोज़ पहले जब लखनऊ सोसाइटी के संस्थापक ने उनसे उनके घर पर मुलाकात की तो सबसे पहला जुमला जो उन्होने कहा वो ये था- नौ-जवानों को अच्छा काम करते देख अपने दिन याद आ जाते हैं. आबिद सुहेल साहब का इतना कहना यकीनन हमारे लिए बहुत कीमती था. हम उन्हे सलाम करते हैं.

ब-ईं सैले-ग़मो- सैले-हवादिस
मिरा सर है कि अब भी खम नहीं है